अरविंद तिवारी
बोकारो/ देश में शोषण और उन्माद की प्रक्रिया चल रही है। एक कदम कोई अच्छा बढ़ाने पर दूसरा कदम घातक सिद्ध हो जाता है। धर्म के बिना राजनीति संभव नहीं। धर्म की सीमा के बाहर तो राजनीति की कल्पना ही नहीं की जा सकती। वह तो उन्माद तंत्र है।
पूर्वाम्नाय गोवर्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्त श्रीविभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज ने बोकारो में जनसंवाद कार्यक्रम के दौरान एक खास बातचीत में उक्त बातें कहीं। उन्होंने कहा कि भारत में हिंदूत्व खतरे में था , है और राजनेताओं के अदूरदर्शिता के कारण खतरों में होते रहेंगे। देश में कोई भी ऐसा राजनीतिक दल नही है जो भारत की मेधाशक्ति, रक्षाशक्ति ,वाणिज्यशक्ति ,और श्रमशक्ति का उपयोग भारत के लिये कर सके। कोई भी दल लोकतंत्र की रक्षा में सफल नहीं है। ऐसी परिस्थिति में हम लोगों से परामर्श लेकर जो देश को दिशा देनी चाहिये उसे लेकर राजनैतिक दलों को आगे आना चाहिये। कदाचित , वे एेसा नहीं करेंगे , तो हमारी परंपरा कि हम जैसा शासन चाहते हैं , बना देते हैं। उन्माद तंत्र हम अधिक समय तक नहीं रहने देंगे। हम लुंज-पुंज नहीं रह सकते। हम राष्ट्र या विश्व की उपेक्षा नहीं कर सकते। राजनीति के साथ- साथ ब्यासपीठ और गुरु गद्दी में जो राजनीति के कारण विकृतियांँ आयीं है , दोनों का शोधन करना, दोनों में सैद्धांतिक सामंजस्य स्थापित करके भारत को अपेक्षित शासन देना हमारा दायित्व होता है , उसके निर्वाह में हम संकोच नहीं करेंगे। देवर्षि नारद ने हिरण्यकश्यप के शासन , वशिष्ठ ने रावण के शासन तंत्र, व्यासजी ने कंस एवं दुर्योधन के शासनतंत्र और शंकराचार्य ने बौद्धों के शासनतंत्र के उच्छेद का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। उन्होंने कहा कि सत्ता लोलुपता और अदूरदर्शिता के चपेट से राजनेता और राजनीति को मुक्त करने का प्रकल्प होना चाहिये। शिक्षा पद्धति में नीति और अध्यात्म का सन्निवेश होना चाहिये , साथ ही हमारे शासनतंत्र से मंदिर और मठ अलग होना चाहिये।

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